India V/s Australia: सिडनी का ग्राउंड गुलाबी क्यों हो गया था?

भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच खेले जा रहे पिंक टेस्ट मैच के तीसरे दिन सिडनी का हरा-भरा ग्राउंड गुलाबी हो गया. स्तन कैंसर के प्रति जागरुकता फैलाने के लिए यहां क्रिकेट और संस्कृति का अनोखा संगम देखने को मिला.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ग्राउंड पर गुलाबी साड़ी पहने कम-से-कम सौ महिलाएं मौजूद थीं, जो ब्रेस्ट स्क्रीनिंग और केयर के प्रति जागरुकता फैलाने के लिए आईं थीं. ना सिर्फ औरतों बल्कि मर्दों ने भी गुलाबी पगड़ी, कमीज़ और टोपी पहनकर इस अभियान का समर्थन किया.

भारतीय कप्तान विराट कोहली ने भी अपने दस्तानों और पैड पर भी गुलाबी रंग की पट्टी लगाई थी. उनके बैट पर भी गुलाबी रंग का स्टिकर लगा हुआ था. न्यू साउथ वेल्स स्थित कैंसर इंस्टीट्यूट के मुताबिक भारत और श्रीलंकाई मूल की 50 से 74 साल की महिलाएं ब्रेस्ट स्क्रीनिंग कराने के मामले में सबसे पीछे हैं.

रंग लाती कोशिशें

इसी मामले में जागरुकता फैलाने के लिए एनएसडब्ल्यू स्थित मल्टीक्लचरल हेल्थ कम्यूनिकेशन सर्विस ने कई दूसरी संस्थाओं के साथ मिलकर 2014 में पिंक साड़ी प्रोजेक्ट शुरू किया था.

इस प्रोजेक्ट को लंबे समय के लिए जारी रखने के मकसद से साल 2016 की अक्टूबर में एक टीम ने पिंक साड़ी इनकॉर्पोरेटेड की शुरुआत की.

शुरुआत में इस संस्था का लक्ष्य भारत और श्रीलंका की महिलाओं में स्क्रीनिंग को पांच प्रतिशत बढ़ाने का था, लेकिन पिछले चार सालों में इनकी कोशिशों से ये 14 प्रतिशत हो गया है.

गुलाबी साड़ी, पगड़ियों और कुर्तों में मौजूद संस्था से जुड़े लोगों और समर्थकों ने “नियमित रूप से स्क्रीनिंग कराने” का संदेश दिया.

न्यू साउथ वेल्स स्थित गैर-लाभकारी संस्था पिंक साड़ी, मैक्ग्रा फाउंडेशन के साथ मिलकर काम करती है. मैक्ग्रा फाउंडेशन को ऑस्ट्रेलिया के पूर्व तेज़ गेंदबाज़ ग्लेन मैक्ग्रा ने अपनी पत्नी जेन मैक्ग्रा के साथ मिलकर 2005 में शुरू किया था.

ग्लेन मैक्ग्रा की पत्नी जेन मैक्ग्रा की मौत 2008 में स्तन कैंसर की वजह से हुई थी. ये फाउंडेशन स्तन कैंसर के ख़िलाफ़ मुहिम चला रहा है.

मैक्ग्रा फाउंडेशन से जुड़ाव के बाद पिंक साड़ी भी इस अभियान का अब हिस्सा बन चुका है. पिंक साड़ी संस्था की अध्यक्ष शांता विश्वनाथन कहती हैं, “पहली बार हम क्रिकेट के ज़रिए उन लाखों लोगों तक अपना संदेश पहुंचा रहे हैं जो इस भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच हो रहे मैच को देख रहे हैं. मैक्ग्रा फाउंडेशन लोगों को ब्रेस्ट स्क्रीनिंग और बीमारी का जल्द पता लगाने का महत्व बता रहे हैं.”

उन्होंने कहा, “फाउंडेशन ब्रेस्ट कैंसर का इलाज भी करती है. इसके लिए हमारे पास प्रशिक्षित ब्रेस्ट केयर नर्से हैं. ये लोग पीड़ित महिलाओं को बीमारी से निजात का काम करते हैं. हम भारत और श्रीलंका से भी नर्सों को नौकरी पर रखने के बारे में सोच रहे हैं ताकि वहां भी पीड़ितों को फ़ायदा हो सके.”

शांता अपने पति और बच्चों के साथ 1980 में बेंगलुरु से आकर सिडनी में बस गई थीं. वो सहेली-सेवा (साउथ एशियन हब फॉर एंटरप्राइज़, लीडरशीप एंड इनिशिएटिव्स – सोशल एंटरप्रिनेरियल वेंचर ऑफ ऑस्ट्रेलियन साउथ एशियन्स) संस्था के साथ जुड़ी हैं. ये संस्था महिलाओं की सेहत और सामाजिक-आर्थिक बेहतरी के लिए काम करती है.

ऑस्ट्रेलिया में 85 साल की उम्र तक हर आठ में से एक महिला ब्रेस्ट कैंसर की चपेट में आ जाती है.

नियमित मैमोग्राम चेकअप से बचाव

इसके लिए यहां ब्रेस्टस्क्रीन ऑस्ट्रेलिया नाम का राष्ट्रीय ब्रेस्ट कैंसर स्क्रीनिंग प्रोग्राम चलाया जा रहा है. इसके तहत 50 से 74 साल की महिलाओं को हर दो साल में मुफ्त मैमोग्राम की सुविधा मिलती है, ताकि बीमारी का समय रहते पता लगाकर ब्रेस्ट कैंसर से होने वाली मौतों को रोका जा सके.

पिंक साड़ी संस्था से जुड़े लोगों ने जब स्क्रीनिंग के प्रति जागरुकता फैलाने का काम शुरु किया था, तो लोगों के मन में हिचकिचाहट थी.

कई महिलाएँ कहती थीं कि उनमें जब किसी तरह का लक्षण ही नहीं है, तो ब्रेस्ट कैंसर नहीं हो सकता, और अगर किस्मत में यही लिखा है तो कोई कैसे इसे होने से रोक सकता है.

कई लोगों को तो ये भी लगा कि स्क्रीनिंग से कैंसर हो सकता है और कुछ को स्क्रीनिंग से पहले होने वाले कुछ मिनटों के दर्द को लेकर डर लग रहा था.

कई महिलाएं शर्म के कारण मैमोग्राम नहीं कराना चाहती थीं. इसके अलावा कई बार लोग कैंसर जैसी बीमारी के बारे में दूसरों को बताना नहीं चाहते. कई महिलाएं स्क्रीनिंग कराती हैं, लेकिन हर दो साल में नियमित रूप से नहीं करातीं.

अपने पति और दो बच्चों के साथ 1984 में दिल्ली से सिडनी आकर बस गईं अनूप जोहर कहती हैं, “दक्षिण एशिया की बहुत कम महिलाएं स्क्रीनिंग कराती हैं. दक्षिण एशिया के समुदायों में महिलाएं ही पूरे परिवार की देखभाल करती हैं, लेकिन खुदके स्वास्थ्य का ध्यान रखना भूल जाती हैं. जब वो विदेश में बस जाती हैं तो अंग्रेज़ी कम जानने के वजह से स्क्रीनिंग का महत्व समझ नहीं पाती. इसलिए हम यहां रहने वाली भारतीय महिलाओं के लिए भारतीय भाषा में भी सेशन आयोजित करते हैं. जैसे कई गुरद्वारों में हम पंजाबी भाषा में सेशन आयोजित करते हैं.”

अनूप स्टेट डिपार्टमेंट ऑफ हेल्थ के पश्चिमी सिडनी स्थित लोकल हेल्थ डिस्ट्रिक्ट में हेल्थ एजुकेटर के तौर पर काम करती हैं. वो पिंक साड़ी संस्था के साथ भी जुड़ी हैं.

भारत जाने के अपने अनुभव पर अनूप कहती हैं, “मैं पिंक साड़ी के साथ जुड़ी हूं. जब मैं लोगों को ब्रेस्ट कैंसर के प्रति जागरुक करती हूं तो वो इसमें दिलचस्पी लेते हैं और सुनते हैं. लोग धीरे-धीरे स्क्रीनिंग का महत्व समझने लगे हैं और वो भारत के लिए आयोजित की जाने वाली जागरुकता पहलों का हिस्सा भी बन रहे हैं. मेरी आंटी को कैंसर डिटेक्ट हुआ था, जिसका उन्होंने इलाज कराया. अब वो हमारे पारिवारिक वॉट्सऐप ग्रुप में परिवार की दूसरी महिलाओं को मैमोग्राम कराने के लिए प्रोत्साहित करती हैं.”

2018 में जारी की गई लैंसेट रिपोर्ट के मुताबिक 2010 से 2014 के बीच भारत में इस 66.1 प्रतिशत महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर की बीमारी होने का पता चला. भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक यहां की महिलाओं के सबसे ज़्यादा होने वाला कैंसर ब्रेस्ट कैंसर ही है.

पिंक साड़ी फेसबुक और दूसरे सोशल मीडिया माध्यमों के ज़रिए दुनियाभर में अपने संदेश दे रहा है.

अपर्णा तिजोरीवाला ने ब्रेन ट्यूमर की वजह से अपनी मां को खो दिया था. वो कहती हैं, “हमारा संदेश है कि शर्माएँ नहीं, तारीख तय करें और महिला को मैमोग्राम के लिए क्लिनिक लेकर जाएं.”

अपर्णा का मानना है कि क्रिकेट टेस्ट मैच हिंदुस्तानियों तक पहुँचने का सबसे अच्छा प्लेटफॉर्म है. वो कहती हैं, “खेलों में ज़्यादातर मर्दों की दिलचस्पी होती है. लेकिन ये मर्दों की भी ज़िम्मेदारी है कि वो अपनी पत्नियों को स्क्रीनिंग कराने के लिए प्रोत्साहित करें.”

Continue reading on BBC Indian Languages:

English Translation: English Translation of Pink Sari

BBC Hindi: https://www.bbc.com/hindi/sport-46772040

BBC Punjabi: https://www.bbc.com/punjabi/international-46770190

BBC Telugu: https://www.bbc.com/telugu/international-46772983

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